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"दुर्गादास" मुंशी प्रेमचंद की एक महत्वपूर्ण रचना है, जो भारतीय समाज के संघर्ष, नैतिकता, त्याग और मानवीय संबंधों की गहरी पड़ताल करती है। उपन्यास का प्रमुख पात्र दुर्गादास एक ऐसा व्यक्ति है जो जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी ईमानदारी, आदर्श, आत्मसम्मान और मानवीय मर्यादा को नहीं छोड़ता। कहानी में परिवार-बंधन, गरीबी-विपन्नता सामाजिक दबाव और मनुष्य के अंतद्भद्ध को अत्यंत मार्मिक संवेदनाओं के साथ उकेरा गया है। दुर्गादास का चरित्र भारतीय मध्यवर्गीय जीवन के उन मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है जो कठीन समय में भी सत्य और कर्तव्य को सर्वोपरि रखते हैं। प्रेमचंद की प्रखर सामाजिक दृष्टि, सहज भाषा और पात्रों की वास्तविकता इस रचना को मानवीय संवेदना और सामाजिक चेतना की अमर मिसाल बनाती है। यह उपन्यास पाठकों को यह अनुभव कराता है कि जीवन की कठिन राहों पर भी निष्ठा और सदाचार ही मनुष्य को महान बनाते हैं।

 

            मुंशी प्रेमचंद (1880-1936) हिन्दी-उर्दू साहित्य के उपन्यास सम्राट और यथार्थवादी लेखन के अग्रदूत थे। उनकी रचनाएँ भारतीय जीवन की सच्चाइयों, किसान-मजदूर वर्ग की पीडा स्त्री-विमर्श, नैतिक संघर्ष और सामाजिक अन्याय को उजागर करती हैं।

 

मुख्य कृतियाँ-

उपन्यासः गोदान, गबन, कर्मभूमि, रंगभूमि, निर्मला

कहानी-संग्रहः मानसरोवर सहित अनेक कहानियाँ

नाटक निबंधः प्रेमाश्रम, सामाजिक सुधार संबंधी निबंध

 

प्रेमचंद ने साहित्य को समाज सेवा और मानवत की सूचना का माध्यम माना। उनकी शैली सहज, मार्मिक और जन-जीवन के बिल्कुल निकट है। उनकी रचनाएँ आज भी सामाजिक समानता, नैतिकता और मानव-गरिमा की प्रेरणा देती हैं। मुंशी प्रेमचंद भारतीय साहित्य में यथार्थ, संवेदना और आदर्शवाद के युग के अमर दीप है। 

दुर्गादास

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