"भूतनाथ" हिन्दी जगत के लोकप्रिय साहित्यकार देवकीनन्दन खत्री का अत्यन्त प्रसिद्ध उपन्यास है। यह उनकी प्रसिद्ध चन्द्रकान्ता कथा श्रृंखला का महत्वपूर्ण भाग है। रहस्य, रोमांच, प्रेम और पांचों से भरपूर यह कथा पाठकों को कल्पना-लोक में ले जाती है. जहाँ ऐयारों की चालबाजियाँ, गुप्त मार्ग, रहस्यमय किलों और अद्भुत पात्रों का संसार जीवंत हो उठता है। मुख्य पात्र भूतनाथ अपनी विलक्षण बुद्धि, साहस और आकर्षक व्यक्तित्व के कारण पाठकों के हृदय में अमिट स्थान चना लेता है। इस उपन्यास की विशेषता यह है कि यह रहस्य-रोमांच और चरित्र-विषण दोनों में अनुपम है। कथा का प्रवाह रोचक है, घटनाओं में कौतूहल है और भाषा में वह पुरानी देसी मिठास है जो पाठक को तन्मय कर देती है। यह कृति हिन्दी उपन्यास इतिहास में रोमांच और कल्पना के स्वर्ण-युग का प्रतीक मानी जाती है, जिसे पढ़कर आज भी पाठक साहित्य की अद्भुत दुनिया में खो जाते हैं।
देवकीनन्दन खत्री (1861-1913) हिन्दी के प्रथम लोकप्रिय और जन-प्रिय उपन्यासकारों में गिने जाते हैं। उनकी लेखनी ने हिन्दी पाठकों को पहली बार रहस्य-रोमांच की नई दुनिया से परिचित कराया।
मुख्य रचनाएँ-
चन्द्रकान्ता
चन्द्रकान्ता संतति
भूतनाथ
कहानी संग्रह व ऐयारी कथाएँ
खत्री जी की भाषा अत्यंत सरल, प्रवाहपूर्ण और मनोरंजक है। उनके साहित्य ने उस समय की आम जनता में हिन्दी पढ़ने-लिखने की रुचि बढ़ाई, और लोग उनकी रचनाओं को पढ़ने के लिए स्वयं हिन्दी सीखने लगे यह उनकी लोकप्रियता और प्रभाव का प्रमाण है। भारतीय साहित्य में रहस्य-रोमांच शैली को प्रतिष्ठा दिलाने का श्रेय बड़े स्तर पर उन्हें ही जाता है। उनकी रचनाएँ आज भी पाठकों को वैसी ही तन्मयता और आनंद देती हैं, जैसी प्रकाशित होने के समय देती थीं।
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