यह पुस्तक लेखक की स्मृतियों एवं पारिवारिक विवरणों पर आधारित एक भावनात्मक एवं रचनात्मक प्रस्तुति है। इसमें वर्णित किसी भी पात्र, घटना या प्रसंग की ऐतिहासिक अथवा तथ्यात्मक प्रामाणिकता का दावा नहीं किया जाता है।
यदि किसी जीवित या दिवंगत व्यक्ति, वास्तविक घटना या स्थान से कोई साम्य प्रतीत होता है, तो वह पूर्णतः संयोग मात्र है।
यह कृति एक पुत्र द्वारा अपने माता-पिता को समर्पित भावनात्मक श्रद्धांजलि है। किसी भी व्यक्ति, परिवार, समुदाय या संस्था की भावनाओं को आहत करने का कोई उद्देश्य नहीं है। यदि अनजाने में किसी को ठेस पहुँचती है, तो लेखक उसके लिए खेद व्यक्त करता है।
रवि प्रकाश जायसवाल
नई दिल्ली में जन्मे रवि प्रकाश जायसवाल का जीवन साधारण परिवेश से असाधारण कर्मयात्रा की कहानी है। नगर निगम के विद्यालयों से प्रारम्भ हुई शिक्षा ने उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय तक पहुँचाया, जहाँ से उन्होंने वाणिज्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। साहित्य के प्रति अनुराग ने उन्हें हिन्दी में स्नातकोत्तर हेतु चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ की ओर अग्रसर किया। भाषा की संवेदनशीलता को और निखारने के लिए उन्होंने अनुवाद विज्ञान में अध्ययन भारतीय विद्या भवन एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर से किया।
उनकी व्यावसायिक यात्रा अनुशासन और उत्तरदायित्व की यात्रा रही है। उनकी यह यात्रा वर्ष 1986 में दिल्ली फाइनेंशियल कॉर्पोरेशन से आरम्भ हुई। तत्पश्चात आयकर विभाग तथा रक्षा मंत्रालय के विभिन्न दायित्वपूर्ण पदों पर सेवा देते हुए उन्होंने प्रशासनिक, अनुशासन और राष्ट्रसेवा के मूल्यों को निकट से जिया।
1994 में केनरा बैंक से जुड़कर उन्होंने देश के विभिन्न नगरों में सेवा दी जैसे लखनऊ, जयपुर, चंडीगढ़, गुरुग्राम, आगरा, पटना, दिल्ली और वर्तमान में बैंक के प्रधान कार्यालय, बेंगलुरु में महा प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं। सरकारी नियमों के अनुसार , दिनांक 31 मई 2026 को इनकी सेवानिवृत्ति निर्धारित है ।
परंतु उनकी पहचान केवल एक वरिष्ठ बैंक अधिकारी की नहीं है। वे स्मृतियों के संवाहक, परंपराओं के संरक्षक और अनुभवों के साक्षी हैं। यह पुस्तक उनके जीवन में संचित उन संस्कारों, संघर्षों और पारिवारिक कथाओं का साहित्यिक रूप है, जिन्हें वे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना अपना दायित्व मानते हैं।
दोहरीघाट से दिल्ली : संस्कारों की विरासत
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