"दोहरीघाट से दिल्ली" संघर्ष, संकल्प और सफलता की गाथा।
भारत की राजधानी दिल्ली आज जिस स्वरूप में दिखाई देती है, उसके निर्माण में देश के विभिन्न हिस्सों से आए लाखों प्रवासियों का योगदान रहा है। इनमें पूर्वांचल से आए परिवारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह कहानी ऐसे ही एक परिवार की है, जिसकी यात्रा वर्ष 1954 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन जिला मऊ स्थित दोहरीघाट से प्रारंभ हुई और जिसने संघर्षों की अग्निपरीक्षा से गुजरते हुए आने वाली पीढ़ियों के लिए सफलता का मार्ग प्रशस्त किया।
सन् 1954 का भारत आज के भारत से बिल्कुल अलग था। गांवों में सीमित संसाधन, रोजगार के अवसरों का अभाव और बेहतर जीवन की तलाश ने अनेक युवाओं को अपने घर-परिवार और मिट्टी से दूर जाने के लिए विवश किया। ऐसे ही सपनों और चुनौतियों को साथ लेकर इस परिवार के मुखिया ने दोहरीघाट से दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। उस समय न तो आधुनिक परिवहन सुविधाएँ थीं, न रहने की व्यवस्था और न ही कोई सामाजिक सुरक्षा। दिल्ली उनके लिए अवसरों का नगर थी, लेकिन वहाँ तक पहुँचने का मार्ग कठिनाइयों और अनिश्चितताओं से भरा हुआ था।
दिल्ली पहुँचकर उन्होंने छोटे-छोटे कार्यों से अपनी जीविका आरंभ की। कभी दिन-रात मेहनत, कभी आर्थिक अभाव, कभी सामाजिक उपेक्षा और कभी परिवार से दूर रहने की पीड़ा—इन सबके बीच उन्होंने अपने सपनों को जीवित रखा। उनके जीवन का अधिकांश भाग संघर्ष में बीता, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने अपने बच्चों को वह अवसर देने का संकल्प लिया जो उन्हें स्वयं नहीं मिल सके थे।
समय के साथ परिवार की दूसरी पीढ़ी ने शिक्षा प्राप्त की, रोजगार के बेहतर अवसर हासिल किए और समाज में अपनी पहचान बनाई। आज परिवार के सदस्य विभिन्न क्षेत्रों में सफल हैं, सम्मानित जीवन जी रहे हैं और समाज में योगदान दे रहे हैं। लेकिन इस सफलता की नींव उन हाथों ने रखी थी जो जीवन भर श्रम करते रहे; उन आंखों ने रखी थी जिन्होंने अपने सपनों का त्याग कर अगली पीढ़ी के सपनों को साकार होते देखने का संकल्प लिया था।
दुर्भाग्य से सफलता की कहानियों में अक्सर अंतिम परिणाम दिखाई देता है, लेकिन उस परिणाम के पीछे छिपे संघर्ष, त्याग और बलिदान की चर्चा कम होती है। हम नई पीढ़ी की उपलब्धियों का उत्सव मनाते हैं, परंतु उन माता-पिता और दादा-दादी को भूल जाते हैं जिन्होंने अपने जीवन की हर खुशी, हर सुविधा और कभी-कभी अपनी इच्छाओं तक का त्याग कर परिवार की उन्नति का मार्ग प्रशस्त किया।
"दोहरीघाट से दिल्ली" केवल भौगोलिक दूरी की कहानी नहीं है; यह एक पीढ़ी द्वारा दूसरी पीढ़ी के लिए किए गए त्याग, परिश्रम और समर्पण का जीवंत दस्तावेज है। यह उन लाखों पूर्वांचल प्रवासियों को श्रद्धांजलि है जिन्होंने अपने पसीने से दिल्ली की धरती को सींचा और अपने संघर्षों से आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को उज्ज्वल बनाया।
आज जब हम अपनी उपलब्धियों पर गर्व करते हैं, तब हमें उन अनदेखे नायकों को भी याद करना चाहिए जिनके त्याग के बिना यह सफलता संभव नहीं थी। उनकी कहानी केवल परिवार की धरोहर नहीं, बल्कि भारतीय समाज के प्रवासन, संघर्ष और सामाजिक परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।"दोहरीघाट से दिल्ली" पूर्वांचल के प्रवासियों की सामूहिक गाथा है। "दोहरीघाट से दिल्ली" किसी एक व्यक्ति, परिवार या गाँव की कहानी नहीं है। यह उन लाखों परिवारों की सामूहिक स्मृति है जिन्होंने पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और भारत के अनेक ग्रामीण अंचलों से निकलकर पिछले पाँच, छह और सात दशकों में दिल्ली की ओर पलायन किया। दोहरीघाट यहाँ एक प्रतीक है, उस मिट्टी का, उस गाँव का, उस घर का, जिसे छोड़कर बेहतर भविष्य की तलाश में लोग महानगरों की ओर निकल पड़े।
यह कहानी उन लोगों की है जिन्होंने अपने वर्तमान का त्याग कर आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बनाया। जिनके हाथों में कलम की जगह फावड़ा था, जिनके पैरों ने खेतों की पगडंडियों से लेकर दिल्ली की गलियों तक का सफर तय किया, और जिन्होंने अपने सपनों को सीमित कर अपने बच्चों के सपनों को विस्तार दिया।
पिछली शताब्दी के मध्य से लेकर आज तक पूर्वांचल से दिल्ली का प्रवास केवल जनसंख्या का स्थानांतरण नहीं था। यह सामाजिक परिवर्तन, आर्थिक संघर्ष और सांस्कृतिक पुनर्निर्माण की एक लंबी प्रक्रिया थी। हजारों परिवार गाँवों से निकलकर दिल्ली की झुग्गियों, किराए के कमरों, श्रमिक बस्तियों और पुनर्वास कॉलोनियों में आकर बसे। उन्होंने कारखानों में काम किया, रिक्शा चलाया, निर्माण स्थलों पर श्रम किया, छोटी दुकानें चलाईं, सरकारी और निजी संस्थानों में सेवाएँ दीं और धीरे-धीरे दिल्ली के सामाजिक और आर्थिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गए।
लेकिन इस यात्रा की सबसे बड़ी कीमत पहली पीढ़ी ने चुकाई। उन्होंने अभाव देखे, अपमान सहा, अकेलापन झेला, सीमित संसाधनों में परिवार पाला और अपने बच्चों की शिक्षा तथा भविष्य के लिए स्वयं को खपा दिया। उनके जीवन का बड़ा हिस्सा संघर्ष की भट्ठी में बीता, परन्तु उन्होंने हार नहीं मानी। वे जानते थे कि शायद उन्हें वह जीवन न मिले जिसका उन्होंने सपना देखा था, लेकिन उनकी अगली पीढ़ी अवश्य उस मंज़िल तक पहुँचेगी।
आज दूसरी और तीसरी पीढ़ी शिक्षित है, प्रतिष्ठित पदों पर है, व्यवसाय चला रही है, प्रशासन, बैंकिंग, शिक्षा, विज्ञान, कला और राजनीति सहित विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रही है। उनकी सफलता दिखाई देती है, परंतु उस सफलता की नींव में पहली पीढ़ी के त्याग, श्रम और बलिदान की अनगिनत परतें छिपी हुई हैं।
यह पुस्तक उन अनाम नायकों को समर्पित है। उन माता-पिता, दादा-दादी और पूर्वजों को, जिन्होंने अपने जीवन की आहुति देकर आने वाली पीढ़ियों के लिए अवसरों का द्वार खोला। यह उनके संघर्षों का सम्मान है, उनकी स्मृतियों का संरक्षण है और उस ऋण को स्वीकार करने का एक विनम्र प्रयास है जिसे कोई भी पीढ़ी पूरी तरह चुका नहीं सकती।
"दोहरीघाट से दिल्ली" वस्तुतः पूर्वांचल से दिल्ली तक की यात्रा नहीं, बल्कि त्याग से उपलब्धि तक, संघर्ष से सम्मान तक और एक पीढ़ी के बलिदान से दूसरी पीढ़ी के उत्थान तक की यात्रा है।
प्रस्तुत पुस्तक "दोहरीघाट से दिल्ली" पूर्वांचल के प्रवासियों का संघर्ष, त्याग और पीढ़ियों की सफलता की गाथा है।"दोहरीघाट से दिल्ली" उन अनाम नायकों की कहानी जिन्होंने अपना जीवन देकर अपनी पीढ़ियों का भविष्य बनाया।
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