"वनोपज और आदिवासी" पुस्तक भारत के समृद्ध वन संसाधनों और वहां निवास करने वाले जनजातीय समुदायों के बीच सहस्राब्दियों पुराने और अटूट संबंधों का एक विस्तृत दस्तावेज है । डॉ. योगेश यादवराव सुमठाणे और डॉ. अर्जुन प्रसाद वर्मा द्वारा लिखित यह पुस्तक आदिवासियों के जीवन, उनकी संस्कृति और वनों के साथ उनके गहन सहजीवन की गहराई से पड़ताल करती है ।
इस पुस्तक के लेखक डॉ. योगेश यादवराव सुमठाणे और डॉ. अर्जुन प्रसाद वर्मा, बाँदा कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं । इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य वन और आदिवासी जीवन के बीच के जटिल संबंधों के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय आयामों का विश्लेषण करना है । लेखकों का मानना है कि वनों और आदिवासियों के बीच के इस रिश्ते की बेहतर समझ ही उनके अधिकारों की रक्षा करने और वनों के सतत भविष्य को सुनिश्चित करने में मदद करेगी ।
पुस्तक का परिचय और मूल उद्देश्य "वनोपज और आदिवासी" पुस्तक भारत के समृद्ध वन संसाधनों और वहां निवास करने वाले जनजातीय समुदायों के बीच के गहरे और अटूट संबंधों का एक प्रामाणिक दस्तावेज है। डॉ. अर्जुन प्रसाद वर्मा और डॉ. योगेश यादवराव सुमठाणे द्वारा लिखित यह पुस्तक आदिवासियों के जीवन, उनकी सांस्कृतिक विरासत और वनों के साथ उनके गहन सहजीवन की पड़ताल करती है। इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि कैसे वन न केवल आदिवासियों के लिए निवास स्थान हैं, बल्कि उनके आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक अस्तित्व का आधार भी हैं। लेखकों ने इस बात पर जोर दिया है कि आदिवासियों और वनों का रिश्ता केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और पूरक है।
आजीविका और लघु वनोपज का महत्व इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा 'लघु वनोपज' (Minor Forest Produce - MFP) पर केंद्रित है, जो जनजातीय समुदायों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। आदिवासी समुदाय फल, फूल, शहद, औषधीय पौधों, गोंद और बांस जैसे वन संसाधनों का संचयन कर अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करते हैं। यह वनोपज न केवल उन्हें भोजन और औषधि प्रदान करती है, बल्कि स्थानीय बाजारों में आय का एक मुख्य स्रोत भी बनती है। पुस्तक विस्तार से बताती है कि किस प्रकार ये संसाधन आदिवासी परिवारों को खाद्य सुरक्षा और स्वावलंबन प्रदान करते हैं, जिससे उनका जीवन चक्र प्राकृतिक लय के साथ जुड़ा रहता है।
सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक ज्ञान आदिवासियों की संस्कृति, उनके रीति-रिवाज, लोकगीत और त्यौहार पूरी तरह से प्रकृति और वनों के इर्द-गिर्द बुने गए हैं। पुस्तक इस बात को रेखांकित करती है कि इन समुदायों के पास वनों और जैव विविधता के संरक्षण का सदियों पुराना पारंपरिक ज्ञान है। वे जानते हैं कि संसाधनों का उपयोग इस तरह कैसे किया जाए कि प्रकृति को नुकसान न पहुंचे। उनके लिए वन एक 'पवित्र उपवन' (Sacred Grove) की तरह हैं, जहाँ वे अपने पूर्वजों और देवताओं का वास मानते हैं। यह सांस्कृतिक जुड़ाव ही उन्हें वनों का सबसे सच्चा और समर्पित संरक्षक बनाता है, जो आधुनिक दुनिया के लिए भी एक मिसाल है।
चुनौतियां, कानूनी अधिकार और भविष्य की राह अंतिम भाग में पुस्तक आदिवासियों के सामने आने वाली आधुनिक चुनौतियों जैसे विस्थापन, बिचौलियों द्वारा आर्थिक शोषण और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर प्रकाश डालती है। लेखक 'वन अधिकार अधिनियम' (2006) और 'पेसा' (PESA) जैसे कानूनों की प्रासंगिकता पर चर्चा करते हैं, जो इन समुदायों को उनकी भूमि और संसाधनों पर कानूनी अधिकार प्रदान करते हैं। पुस्तक यह निष्कर्ष निकालती है कि आदिवासियों का सशक्तिकरण और वनों का संरक्षण अलग-अलग नहीं हैं। यदि हमें वनों को बचाना है, तो आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा करना और उनके पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक प्रबंधन का हिस्सा बनाना अनिवार्य है।
"वनोपज और आदिवासी" केवल एक शैक्षणिक अध्ययन नहीं है, बल्कि यह उन समुदायों की आवाज है जो सदियों से प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर रह रहे हैं । यह पुस्तक पाठकों को यह समझने के लिए प्रेरित करती है कि वनों का संरक्षण और आदिवासियों का सशक्तिकरण एक-दूसरे के पूरक हैं ।
डॉ. योगेश यादवराव सुमठाणे
डॉ. अर्जुन प्रसाद वर्मा
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