धर्मपुत्र" आचार्य चतुरसेन शास्त्री का एक प्रसिद्ध उपन्यास है, जो १९६१ में फिल्म "धर्मपुत्र" के रूप में भी लोकप्रिय हुआ था, और इस उपन्यास में भारत के विभाजन के समय के एक युवा व्यक्ति की कहानी है जो अपनी पहचान और परिवार के प्रेम के संघर्ष में फंस जाता है। यह उपन्यास हिंदू और मुस्लिम परिवारों के बीच एक नाजायज बच्चे के हिंदू संस्कारों में पालन-पोषण और उसके माता-पिता के बीच प्रेम और अविश्वास के संघर्ष को दर्शाता है।
धर्मपुत्र
आचार्य चतुरसेन शास्त्री

















