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लेखक की तरफ से : इस पुस्तक की शुरुआत किसी राजनीतिक योजना से नहीं, बल्कि एक साधारण-सी बातचीत से हुई। एक दिन राजनीतिक चर्चा के दौरान बात इस पर चली कि जब किसी व्यक्ति को लगता है कि अब उसे कोई पूछ नहीं रहा, उसका राजनीतिक प्रभाव कम हो गया है या वह हाशिये पर चला गया है, तो ऐसी स्थिति में वह कितना निराश होता होगा। इसी बातचीत में सामने से एक बात कही गई—

“राहुल गांधी को देखिए। उनके नाना प्रधानमंत्री थे, दादी प्रधानमंत्री थीं और पिता भी प्रधानमंत्री थे। आज वह सड़क पर संघर्ष कर रहे हैं, फिर भी डिमोरलाइज नहीं हैं। हम लोगों की तो उनके सामने क्या औकात है।”

यह बात मेरे मन में ठहर गई। मैंने सोचा—आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां हैं, जिनके कारण देश की सबसे पुरानी और लंबे समय तक सबसे प्रभावशाली राजनीतिक पार्टी कांग्रेस आज इस स्थिति में पहुंच गई?

इसी सवाल ने मुझे कांग्रेस की राजनीतिक यात्रा को नए सिरे से देखने के लिए प्रेरित किया। घटनाओं, फैसलों और बदलती राजनीतिक परिस्थितियों का अध्ययन करते हुए मुझे महसूस हुआ कि कांग्रेस हमेशा से इतनी कमजोर नहीं थी। एक समय था जब राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा और देशहित के मुद्दों पर कांग्रेस की अपनी मजबूत पहचान थी। जवाहरलाल नेहरू के दौर में स्वतंत्र भारत के विकास की आधारशिला रखने वाली अनेक बड़ी योजनाओं की शुरुआत हुई। इंदिरा गांधी के समय 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध और बांग्लादेश का निर्माण जैसी ऐतिहासिक घटनाएं हुईं। इंदिरा गांधी की व्यक्तिगत धार्मिक आस्था भी सार्वजनिक जीवन में दिखाई देती थी। वह मंदिर जाती थीं और साधु-संतों से मिलती थीं।

राजीव गांधी के दौर में भी अयोध्या से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला हुआ। राम जन्मभूमि परिसर का ताला खुला और पूजा-अर्चना का रास्ता खुला। यानी कांग्रेस की राजनीति का एक दौर ऐसा भी था, जब वह हिंदू समाज से जुड़े सवालों से इस तरह दूरी बनाकर नहीं चलती थी, जैसी दूरी बाद के वर्षों में दिखाई देने लगी।

फिर कांग्रेस की राजनीति में बदलाव आया। राहुल गांधी के दौर में पार्टी पर राष्ट्रवाद और हिंदू समाज से जुड़े मुद्दों को लेकर लगातार सवाल उठे। राम मंदिर के मुद्दे पर कांग्रेस की भूमिका, उड़ी और अन्य आतंकी घटनाओं के बाद सरकार से पूछे गए सवाल, तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के विषयों पर पार्टी का रुख—इन सबने कांग्रेस की राजनीति को एक नई बहस के केंद्र में ला दिया।

यहीं से मेरे मन में एक बड़ा सवाल पैदा हुआ—क्या कांग्रेस केवल सत्ता से बाहर हुई है, या अपनी पारंपरिक राजनीतिक जमीन से भी दूर हो गई है? इन्हीं सवालों और घटनाओं ने इस पुस्तक को जन्म दिया। और इसी सोच से इस पुस्तक का नाम सामने आया—

“चक्रव्यूह में कांग्रेस : हिंदुत्व में हारी, राष्ट्रवाद में पिछड़ी”

यह पुस्तक किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में केवल आरोप लगाने के लिए नहीं लिखी गई है। मेरा प्रयास यह समझने का है कि जिस कांग्रेस ने कभी राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की राजनीति पर लंबे समय तक अपना प्रभाव बनाए रखा, वह आज किन परिस्थितियों में अपने ही बनाए हुए राजनीतिक चक्रव्यूह में फंसती दिखाई दे रही है। 

इस शोध और लेखन के दौरान मेरे सामने एक और दिलचस्प विरोधाभास (Paradox) उभर कर आया, जिसका जिक्र करना मैं यहाँ ज़रूरी समझता हूँ। आज अक्सर यह मान लिया जाता है कि कांग्रेस पूरी तरह से खत्म हो चुकी है। लेकिन क्या सच में ऐसा है? अगर हम डिजिटल युग के आईने (जैसे इंस्टाग्राम) में देखें, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फॉलोअर्स राहुल गांधी से कई गुना ज्यादा हैं। लेकिन जब बात दोनों पार्टियों के आधिकारिक अकाउंट्स की आती है, तो वहां 'कांग्रेस', 'भाजपा' से आगे निकल जाती है।

यह कोई सामान्य आंकड़ा नहीं है। यह बताता है कि पिछले एक दशक में भाजपा सिर्फ एक राजनीतिक पार्टी नहीं रही, बल्कि वह 'नरेंद्र मोदी' रूपी एक महा-ब्रांड का जरिया बन गई है। आम जनमानस के लिए मोदी ही भाजपा हैं। वहीं दूसरी ओर, राहुल गांधी व्यक्तिगत तौर पर भले ही कमज़ोर साबित हो रहे हों, लेकिन कांग्रेस का मूल संगठन, उसका ईकोसिस्टम और उसकी सुप्त ताकत आज भी बहुत गहरी है।

भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इस ज़मीनी हकीकत को बहुत अच्छी तरह समझता है। वे जानते हैं कि कांग्रेस कमज़ोर नहीं है; वह बस अपने नेतृत्व की दुविधा और वैचारिक भटकाव के चक्रव्यूह में फंसी है। जिस दिन कांग्रेस को सही दिशा मिल गई, वह ज़बरदस्त पलटवार कर सकती है। शायद यही कारण है कि अजेय होने के बावजूद भाजपा आज भी लगातार 'कांग्रेस मुक्त भारत' का नारा देती है—क्योंकि राजनीति के इस खेल में उनका असली डर आज भी कांग्रेस की यही सुप्त ताकत है।

मैंने इस पुस्तक में इन्हीं घटनाओं को जोड़ने, उनके पीछे की राजनीति को समझने और कांग्रेस की बदलती विचारधारा तथा राजनीतिक रणनीति का विश्लेषण करने का प्रयास किया है।

यह मेरा निष्कर्ष हो सकता है, लेकिन अंतिम फैसला पाठकों का होगा। पाठक तय करेंगे कि कांग्रेस की इस राजनीतिक यात्रा को समझने और उसके वर्तमान संकट की वजहों को सामने रखने में मैं कितना सफल हुआ।

एक बात को लेकर मैं आज भी आश्वस्त हूं—कांग्रेस के सामने चुनौती केवल सत्ता में वापसी की नहीं है। असली चुनौती अपनी राजनीतिक पहचान, अपनी विचारधारा और अपने पारंपरिक मतदाता वर्ग के साथ उस संबंध को फिर से स्थापित करने की है, जो कभी उसकी सबसे बड़ी ताकत हुआ करता था।

शायद यही वह चक्रव्यूह है, जिससे बाहर निकलने की कांग्रेस आज भी कोशिश कर रही है।

सतीश गोयल (पत्रकार)

मलोट, पंजाब

संपर्क ईमेल : goyalmalout@gmail.com

चक्रव्यूह में कांग्रेस : हिंदुत्व में हारी, राष्ट्रवाद में पिछड़ी

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