"अप्सरा" सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का एक उत्कृष्ट काव्य-ग्रंथ है, जिसमें प्रेम, सौंदर्य-बोष, स्वाभिमान और मानवीय भावनाओं का भावपूर्ण चित्रण मिलता है। इस कृति में निराला प्रकृति-सौंदर्य, स्त्री-सौंदर्य और अंत:चेतना को वैचारिक ऊँचाई प्रदान करते हैं। अप्सरा केवल सौंदर्य की प्रतीक नहीं, बल्कि स्वतंत्र चेतना, आत्मगौरव और आत्मसंघर्ष का प्रतिरूप है। काव्य में कल्पन और यथार्थ का अत्यंत सुंदर संगम दिखाई देता है । कहीं कोमल भावनाओं की तरलता है, कहीं जीवन के संघर्ष का दृद्ध स्वर। भाषा संगीतात्मक, प्रवाहपूर्ण और काव्यात्मक है; अलंकारों और प्रतीकों के माध्यम से निराला ने भावों को जीवंत बना दिया है। "अप्सरा" हिंदी काव्य-परंपरा का ऐस शिखर ग्रंथ है, जो पाठक को सौंदर्य, संवेदना और काव्य-विवेक की नई अनुभूति देता है।
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (1896-1961) हिंदी साहित्य के प्रमुख छायावादी कवि, कथाकार और निबंधकार थे। वे हिंदी कविता में स्वतंत्रता, विद्रोह, मानवीय संवेदना और नवाचार के प्रणेता माने जाते हैं। उनकी प्रमुख कृतियाँ-
काव्य-ग्रंथ : अनामिका, परिमल, अर्चना, राम को शक्ति-पूजा
उपन्यास : अपूर्वा, अलका
कथा-रचनाएँ: चतुरी चमार, सुकुल की चीवी आदि
निराला की भाषा में क्रान्तिकरिता, करुणा और सौंदर्य-चेतना का अद्भुत संतुलन है। उन्होंने परंपरागत काव्य-शैली को तोड़कर हिंदी कवित्ता को नई दिशा दी, इसलिए उन्हें हिंदी काव्य-जगत का महाप्राण कहा गया। उनका साहित्य आज भी पाठकों को नैतिक शक्ति, आत्मसम्मान, स्वतंत्र विचार और मानवीयता की प्रेरणा देता है।
अप्सरा
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