आचार्य रामचंद्र शुक्ल (1884-1941) हिंदी के मूर्धन्य आलोचक, निबंधकार और इतिहासकार थे, जिनका जीवन सादगी, स्वाध्याय और साहित्य साधना का आदर्श था। उन्होंने 'हिंदी साहित्य का इतिहास' लिखकर साहित्यिक मानदंडों को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया और 'चिंतामणि' के माध्यम से गहन मनोवैज्ञानिक निबंध दिए। वे हिंदी साहित्य के एक युग-प्रवर्तक समीक्षक माने जाते हैं।
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