अरावली के मुक्त शिखर के रूप में प्रतिष्ठित स्वातंत्र्यवीर प्रताप पर अनेक उपन्यास नाटक तथा काव्य लिखे गये हैं। आज अतीत और वर्तमान के यथार्थ की गहरी अनुभूति तथा राष्ट्रीय मूल्यों के टकराव के युग में प्रताप को विस्मृत नहीं किया जा सकता। अतः नयी खोजों और नये प्रमाणों के साथ प्रताप के आजीवन स्वातंत्र्य-संघर्ष पर आधारित उपन्यास आपके समक्ष प्रस्तुत हुआ है।
ऐतिहासिक उपन्यास की नयी यर्थाथवादी मुद्रा और नये राष्ट्रीय तेवर ने प्रताप के शौर्य, शील और संकल्प के आधार पर लड़े गये स्वातंत्र्य-संघर्ष को इसमें चित्रित किया है। उनके परम सहयोगी मील पूंजा और सेढ भामा शाह के समर्पित व्यक्तित्व का प्रभावी अंकन हुआ है।
इसमें मुगल शाही हरम के हास विलास के मध्य द्वन्द्वों और आहों का अहसास गहरे रूप में हो सकेगा। जोधाबाई का अन्तर्मन आपके सामने प्रकट हो सकेगा। चिन्तौड़ की पदिमनी और भक्त मीरा बाई के समक्ष बेगम जोधाबाई की क्या स्थिति है? राजनीतिक दबाव की शादी की बेबसी कितनी मर्मस्पर्शिनी है? अपनी संतान के प्रति जोधाबाई की क्या दृष्टि है? सलीम अपनी अम्मी के कितने नजदीक है और कितना दूर है? इसमें आप माँ जोधा के हृदय के दर्द की अनुभूति कर सकेंगे।
उस युग के महान संगीतज्ञ तानसेन और कवि-सेनानी रहीम के जीवन के दर्शन के लिए आपको इस उपन्यास के प्रष्णे को पलटना होगा।
यदि पं. गोपीनाथ प्रताप के पुरोहित हैं तो पं. चक्रपाणि अध्येता अध्यापक तथा गुप्तचर भी हैं। इस रूप में आप सम्पूर्ण मेवाड़ क्षेत्र के साथ दिल्ली, आगरा और फतेहपुर सीकरी तक भ्रमण करेंगे।
आप इक्कीसवीं सदी में रहकर सोलहवीं सदी में विचरण कर सकेंगे जिससे दोनों युगों की समस्याओं और राष्ट्रीय मूल्यों की अनुभूति कर सकें।
भारत की प्रकृति, संस्कृति और जनजीवन की स्थिति पर ही राजनीति उचित है। यह उपन्यास उस शताब्दी की प्रकृति, संस्कृति और जनजीवन के संघर्ष पर आधारित है। अतः यह अरावली का मुक्त शिखर आपके समक्ष है।
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