"अलंकार" मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित एक महत्त्वपूर्ण निबंध संग्रह है, जिसमें उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य में प्रयुक्त अलंकारों की प्रकृति, स्वरूप और प्रभाव का स्पष्ट एवं सरल विवेचन किया है। इस पुस्तक में अलंकारों को केवल साहित्यिक सजावट के रूप में नहीं, बल्कि भाव-विस्तार, अनुभूति-गहनता और सौंदर्य-निर्माण के साधन के रूप में समझाया गया है। प्रेमचंद ने भाषा की शुद्धता, अभिव्यक्ति की सुंदरता और साहित्य की नैतिक दृष्टि को ध्यान में रखते हुए, अलंकारों को व्यावहारिक उद्यहरणों के साथ प्रस्तुत किया है। उनकी भाषा सहज, प्रांजल और जीवन के निकट है। "अलंकार" विद्यार्थियों, अध्यापकों और साहित्य प्रेमियों के लिए उत्तनी ही उपयोगी है, जितनी हिंदी साहित्य की गहन समझ पाने वाले शोधार्थियों के लिए।
मुंशी प्रेमचंद (1880-1936) हिंदी-उर्दू के अमर कथाकार, नाटककार, उपन्यासकार और निबंधकार थे। उन्होंने साहित्य को जन-जीवन से जोड़ा और समाजिक यथार्थ को अपनी रचनाओं का केंद्र बनाया। उनको प्रमुख रचनाएँ हैं-
उपन्यास: गोदान, गबन, रंगभूमि, कर्मभूमि, निर्मला
कहानी संग्रह: मानसरोवर, नशा, पूस की रात अदि
नाटक व निबंध : प्रेम आश्रम, संग्राम, समाज-सुधार विषयक निबंध
उनकी लेखनी में मानवीय संवेदना, समाज-सुधार, नैतिकता और यथार्थवाद का अद्भुत संगम मिलता है। उन्हें "उपन्यास-सम्राट" को उपाधि से सम्मानित किया जाता है। प्रेमचंद की साहित्य-सृष्टि आज भी सामाजिक चेतना को जगत्कर पाठकों को सत्य, संवेदना और मनुष्यता की ग्रह पर ले जाती है।
अलंकार
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